चीन ने जातीय एकता को बढ़ावा देने के लिए जो एक कानून बनाया है, उसके अनुसार ये राष्ट्र के सभी जातीय समूहों के बीच समुदाय की भावना को और मज़बूत करने में सहयोग करेगा। प्रस्तावित कानून में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि सभी सरकारी संस्थाओं और निजी उद्यमों, जिनमें स्थानीय सरकारें और ’ऑल-चाइना वीमेन्स फेडरेशन’ जैसे सरकारी-संबद्ध समूह शामिल हैं, को जातीय एकता को बढ़ावा देना चाहिए। इस संबंध में शिक्षाविदों और पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह नया प्रावधान जातीय अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए एक झटका है, क्योंकि यह अन्य बातों के अलावा, अनिवार्य शिक्षा में मैंडरिन चीनी के उपयोग को अनिवार्य बनाता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि यह कदम कुछ अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों को और कमज़ोर ही करेगा, क्योंकि अधिकारी उन्हें मुख्यधारा में मिलाने की अपनी कोशिशों को और मज़बूत कर रहे हैं। कानून का यह मसौदा दरअसल चीन के लिए एक कठोर और एकसमान वैचारिक ढांचा निर्धारित करता है। इसकी प्रस्तावना में, यह 1949 में स्थापित आधुनिक ’पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की एक अटूट ऐतिहासिक निरंतरता का दावा करता है, जिसे 5,000 वर्षों से अधिक के इतिहास वाली एक सभ्यता’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसने ’चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’ के नेतृत्व में ’एक एकीकृत बहु-जातीय राष्ट्र’ का निर्माण किया है। इस संबंध में शी जिनपिंग अपने भाषणों में नैरेटिव और विशिष्ट वाक्यांशों पर लगातार ज़ोर देते है। इस कानून के मसौदे पर गौर करें तो ऐसी जातीय नीतियां अपनाई गई है, जिनकी मुख्य विशेषता ’जबरन आत्मसातीकरण’[forced assimilation] है।
चीन की अधिकांश आबादी ’हान’ चीनी है और जिनकी आधिकारिक भाषा मैंडरिन है। देश में 55 जातीय समूह हैं, जो 1.4 अरब की आबादी का 8.9: हिस्सा बनाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि व्यवहार में इस नए कानून को ही प्राथमिकता मिलने की संभावना है। पहले से ही इनर मंगोलिया, तिब्बत और शिनजियांग [ चीन के ऐसे इलाके जहाँ जातीय अल्पसंख्यकों की आबादी ज्यादा है] में पढ़ाई का मुख्य माध्यम मैंडरिन है और नया कानून मूल रूप से यह कहता है कि पूरे देश में अल्पसंख्यक भाषाओं को पढ़ाई का मुख्य माध्यम नहीं बनाया जा सकता। नए कानून के अनुच्छेद 15 के अनुसार, सभी बच्चों को किंडरगार्टन से पहले और हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी होने तक, अनिवार्य शिक्षा के पूरे दौर में मैंडरिन चीनी भाषा पढ़ाना ज़रूरी कर दिया गया है।
चीन प्राचीन काल से ही एक एकीकृत, बहु-जातीय देश रहा है। 221 ईसा पूर्व में, चीन में पहला एकीकृत, बहु-जातीय और केंद्रीकृत राज्य, चिन राजवंश, स्थापित किया गया था। आज के गुआंग्शी ज़ुआंग स्वायत्त क्षेत्र और युन्नान प्रांत, जहाँ अल्पसंख्यक लोगों की आबादी ज्यादा है, एकीकृत चिन शासन के अधिकार क्षेत्र में आने वाले प्रिफ़ेक्चर और काउंटी थे। हान राजवंश (206 ईसा पूर्व - 220 ईस्वी) के दौरान, चिन प्रणाली को अपनाकर केंद्रीकृत सामंती राज्य और भी अधिक शक्तिशाली हो गया। हान राजवंश ने पश्चिमी क्षेत्रों (हान राजवंश के समय से, गांसु प्रांत के दुनहुआंग के पश्चिम में स्थित आज के क्षेत्र के लिए इस्तेमाल होने वाला एक सामान्य शब्द) में एक सीमांत कमान मुख्यालय स्थापित किया और वहाँ रहने वाले सभी जातीय समूहों के लोगों पर शासन करने के लिए 17 और प्रिफ़ेक्चर जोड़े। इस तरह, एक विशाल भूभाग वाला ऐसा राज्य अस्तित्व में आया, जिसमें आज शिनजियांग में रहने वाले विभिन्न लोगों के पूर्वज शामिल थे। हान राजवंश और आसपास के अल्पसंख्यक लोगों के बीच लगातार संपर्क के दौरान, चीनी राष्ट्र के लोगों को अन्य जातीय समूहों द्वारा ’हान’ कहा जाने लगा, और इस प्रकार दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला जातीय समूह, ’हान’, उभर कर सामने आया। एक एकीकृत, बहु-जातीय देश के रूप में चीन की नींव चिन राजवंश द्वारा रखी गई थी, और हान राजवंश द्वारा इसे और अधिक सुदृढ़ तथा विकसित किया गया। विभिन्न जातीय समूहों के बीच एकता और सहयोग ने चीन को एक एकजुट बहु-जातीय राष्ट्र के रूप में सुरक्षित रखने में मदद ही की है।
मूल भाषाओं की जगह मैंडरिन को स्थापित करने की सरकारी मंशा
कई विश्लेषकों का तर्क है कि चीन का नया शिक्षा मॉडल तेज़ी से बहुसंख्यक (हान) संस्कृति में आत्मसातीकरण को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया जा रहा है, हालाँकि चीन सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण, आधुनिकीकरण और समान अवसर की नीति के रूप में प्रस्तुत किया है, जो ’चीनी राष्ट्र की एक साझा चेतना’ को बढ़ावा देता है। एक साझा संस्कृति से पता चलता है कि शिक्षा सिर्फ़ अकादमिक नहीं है, बल्कि यह वैचारिक और राष्ट्र-निर्माण से जुड़ी व्यवस्था है। यूं भी भाषा नीति को व्यापक रूप से एकीकरण के मुख्य तंत्र के रूप में देखा जाता है। एकीकरण के मुख्य साधन के रूप में प्रथम नीति के तहत मैंडरिन (पुतोंगुआ) का वर्चस्व है। स्कूलों, सार्वजनिक जीवन और प्रशासन में मैंडरिन को ही प्राथमिकता दी जाती है।। आधिकारिक तौर पर, चीन में 56 मान्यता प्राप्त जातीय समूह हैं, जिनमें ’हान’ चीनी लोगों का वर्चस्व है; देश की 1.4 अरब आबादी में से 91: से अधिक लोग इन्हीं में से हैं। अन्य जातीय अल्पसंख्यक समूह में तिब्बती, मंगोल, हुई, मांचू और उइगर शामिल हैं, जो उन क्षेत्रों में केंद्रित हैं जो मिलकर देश के कुल भूभाग का लगभग आधा हिस्सा बनाते हैं, और जिस क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है।
सरकार भले ही ’अल्पसंख्यक भाषाओं का सम्मान करने’ का दावा करती है, लेकिन आलोचकों का तर्क के अनुसार यह प्रभावी रूप से मूल भाषाओं की जगह मैंडरिन को स्थापित करने में अपनी दिलचस्पी रखती है। जाहिर है यह समय के साथ भाषाई विविधता को कम करती है। प्रमुख परीक्षाओं से अब तक तिब्बती भाषा को मुख्य विषय के रूप में हटा दिया गया है। अल्पसंख्यक भाषाओं में स्कूली शिक्षा की जगह मैंडरिन-माध्यम वाली शिक्षा शुरू हो चुकी है। जिसके संबंध में विद्वान और कार्यकर्ता चेतावनी देते हैं कि भविष्य में, परिणाम के तौर पर सांस्कृतिक विरासत के हस्तांतरण में कमी देखने को मिलेगी। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार चीन की योजना है कि स्वायत्त क्षेत्र के ज्यादातर छात्रों के लिए राष्ट्रीय कॉलेज प्रवेश परीक्षा से तिब्बती भाषा को एक मुख्य विषय के तौर पर हटा दिया जाए; इस कदम से इस भाषा के भविष्य को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। हालांकि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के अध्यक्ष, गामा सेडैन एक प्रेस ब्रीफ़िंग के दौरान यह दावा करते है कि यह बदलाव राष्ट्रीय परीक्षा में किए जा रहे सुधारों का ही एक हिस्सा है और इससे तिब्बतियों के करियर की संभावनाएँ बेहतर ही होंगी। उनके अनुसार तिब्बत में भी, दूसरे प्रांतों और क्षेत्रों की तरह ही परीक्षा के विषय एक जैसे होंगे, जैसे कि चीनी और गणित, और विदेशी भाषाएँ जिनमें अंग्रेज़ी, रूसी, जापानी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश शामिल हैं। लेकिन इस नीति के बाद अब से इस परीक्षा में भी तिब्बती भाषा एक मुख्य विषय नहीं रहेगी।
इस तरह की नीति बनाने से सरकार द्वारा विचारों पर शासन करना जैसा लगता है, जिससे स्वतंत्र सांस्कृतिक अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है। समय के साथ, अल्पसंख्यक भाषाओं की स्थिति में गिरावट आने से, यह पहचान मुख्यधारा के चीनी मानदंडों के अनुरूप ढल सकती है और यही तो सरकार की मंशा है। ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड के अनुसार, ”यह पार्टी के ’सार्थक स्वायत्तता’ के मूल वादे पर आखिरी कील ठोक देता है।“ लीबोल्ड ने इस कदम को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जातीय नीतियों पर ’बड़े पैमाने पर पुनर्विचार, का शिखर बताया।
नई शिक्षा नीति अल्पसंख्यक अधिकारों को कमजोर कर सकती है
चीन का संविधान भाषा के उपयोग, सांस्कृतिक संरक्षण और क्षेत्रीय स्वायत्तता जैसे अल्पसंख्यक अधिकारों की औपचारिक रूप से गारंटी देता है। जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला 2026 का कानून, विशिष्ट जातीय पहचानों के बजाय ’साझा राष्ट्रीय पहचान’ पर ज़ोर देता हैं। नीतियाँ जातीय पहचान के बजाय चीनी राष्ट्र के साथ पहचान को प्राथमिकता देती हैं। इससे पहले के स्वायत्तता ढांचे कमजोर होते हैं। इससे अल्पसंख्यक पहचानों के एक प्रमुख हान-केंद्रित राष्ट्रीय संस्कृति में समाहित होने का खतरा है। आलोचकों का तर्क है कि यह जबरन आत्मसात करने की ओर एक बदलाव भर को दर्शाता है। दरअसल यह अल्पसंख्यक भाषाओं और संस्कृतियों को लगातार हाशिए पर धकेलने का एक खूबसूरत सा औजार है।
2020 में जब नए छात्रों को पता चला कि अब वे अपनी मंगोलियाई भाषा की पाठ्यपुस्तकों का इस्तेमाल नहीं कर सकते, और उन्हें केवल चीनी पाठ्यपुस्तकों का ही उपयोग करना होगा। उस वक्त चीन के इनर मंगोलिया क्षेत्र में मंगोल मूल के लोग, जिनमें छात्र और अभिभावक भी शामिल हैं, एक नई द्विभाषी शिक्षा नीति के खिलाफ़ दुर्लभ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए अपना गुस्सा ज़ाहिर किया। उनका कहना है कि यह नीति मंगोल भाषा को खतरे में डाल रही है। लीबोल्ड और एक पूर्व मंगोलियाई पत्रकार द्वारा सह-लिखित एक लेख के अनुसार, इस नीतिगत बदलाव के कारण बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और तत्काल दमनकारी कार्रवाई हुई, जिसके बाद में ’पुनः-शिक्षा अभियान’ चलाए गए। 2026 की नई नीति के बाद भी हालात में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल रहे। शिनजियांग और इनर मंगोलिया जैसे क्षेत्रों में, इसके कारण विरोध प्रदर्शन और प्रतिरोध देखने को मिल रहा है।
इस संबंध में, विद्वानो का मत है कि इस कानून में ’आपस में घुले-मिले सामुदायिक माहौल’ को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जिसके बारे में उनका कहना है कि इसका नतीजा उन इलाकों के बँटवारे के रूप में सामने आ सकता है जहाँ अल्पसंख्यकों की आबादी ज्यादा है। वहीं दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड के प्रोफ़ेसर मिंगलांग झोउ, जिन्होंने चीन की द्विभाषी नीतियों का अध्ययन किया है, का कहना है कि इसका मकसद हान और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को एक-दूसरे के समुदायों में जाकर बसने के लिए प्रोत्साहित करना है। ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया एसोसिएट डायरेक्टर माया वांग का कहना है कि, जातीय एकता को बढ़ावा देने वाला चीनी सरकार का मसौदा कानून, नौकरशाही और समाज को इस तरह से लामबंद करने की कोशिश करता है कि लोग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एकजुट हो जाएं, भले ही इसके लिए मानवाधिकारों की कीमत चुकानी पड़े। तिब्बती, उइगर और अन्य लोग, जो अल्पसंख्यक आबादी के हक में आवाज़ उठाते हैं, उन्हें सरकार की ओर से और भी ज्यादा दमन का सामना करना पड़ सकता है।
‘जातीय एकता’ की अवधारणा को अक्सर बहुत व्यापक और अस्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाता है। जिन कार्यों को ’जातीय एकता को नुकसान पहुँचाने वाला’ माना जाता है, उनमें सांस्कृतिक वकालत, धार्मिक रीति-रिवाज, सरकारी नीतियों की आलोचना शामिल हो सकता हैं। प्रावधानों का उपयोग इन चीज़ों को सही ठहराने के लिए किया गया है, जैसे-गिरफ्तारियाँ, निगरानी, कार्यकर्ताओं को जेल में डालना आदि। संयुक्त राष्ट्र के निष्कर्षों में यह बताया गया है कि उग्रवाद और अलगाववाद की ये अस्पष्ट परिभाषाएँ शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को भी अपराध बना सकती हैं, विशेष रूप से उइगरों और तिब्बतियों के बीच। परिणामस्वरूप नागरिक स्वतंत्रताएँ, जैसे कि बोलने की आज़ादी और धार्मिक स्वतंत्रता, प्रतिबंधित हो जाती हैं।
एकता से जुड़ी ये नीतियाँ आर्थिक और सामाजिक जीवन तक भी फैली हुई हैं। इसके तहत जातीय अल्पसंख्यकों से जुड़े ज़बरन मज़दूरी कार्यक्रमों के आरोप, सरकार द्वारा संचालित विस्थापन, व्यावसायिक प्रशिक्षण और ’गरीबी उन्मूलन’ योजनाएँ भी निहित है। रिपोर्टों से पता चलता है कि, विशेष रूप से शिनजियांग में, ज़बरदस्ती का इस्तेमाल किया जाता है। कहने को तो इन कार्यक्रमों को विकास के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये पारंपरिक जीवन-शैली को बाधित कर सकते हैं और अल्पसंख्यक आबादी पर सरकार का नियंत्रण बढ़ा सकते हैं।
निष्कर्ष
संक्षेप में कह सकते है जातीय एकता आधारित इस नई नीति का तनाव, राज्य-नेतृत्व वाली एकता यानी एकीकरण, स्थिरता बनाम बहुलतावाद मतलब सांस्कृतिक स्वायत्तता, इन दो बातों के बीच झूलता है। अल्पसंख्यक अधिकार, अक्सर केंद्रीकृत नियंत्रण के एक साधन सह-अस्तित्व के बजाय आत्मसातीकरण ढाँचे के रूप मे काम करता है जो अल्पसंख्यक अधिकारों को राज्य-निर्धारित एकता के अधीन कर देता है।
Image Credits: China Daily HK
Author
Rekha Pankaj
Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.