हाल ही में, दिल्ली और वॉशिंगटन ने 26 मई को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्काे रुबियो की भारत यात्रा के दौरान अहम खनिजों और रेयर अर्थ (दुर्लभ मृदा खनिज) की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए एक फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए; जिसमें इनकी माइनिंग और प्रोसेसिंग भी शामिल है। यह द्विपक्षीय समझौता क्वाड देशों- ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका-के दिल्ली में 20 अरब अमेरिकी डॉलर के ’क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क’ को शुरू करने पर सहमत होने से ही पहले किया गया था। दरअसल इस पहल का मकसद ग्लोबल मार्केट में बढ़ती ज़रूरी मेटल्स की कमी को दूर करना है। अमेरिका द्वारा कई सहयोगी देशों पर टैरिफ़ लगाने के बाद से ही, चीन ने 2025 में ’रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ (REE) के एक्सपोर्ट पर कंट्रोल लगा दिया था। हालांकि विश्लेषक ये भी मानते है कि भारत-अमेरिका और क्वाड-स्तर के फ्रेमवर्क के जरिए, घरेलू कानूनों और नियमों में बेहतर तालमेल और सामंजस्य से सप्लाई चेन तक आसानी से पहुंचा जा सके। इन समझौतों से सहयोगी देशों को राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नियंत्रण कड़े करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। अभी तो, ग्लोबल ’रेयर अर्थ’ और ज़रूरी मिनरल्स के बाज़ार पर चीन का दबदबा है, लेकिन जानकारों का कहना है कि भारत के पास इतने संसाधन, बाज़ार का दायरा और वॉशिंगटन के साथ राजनीतिक भरोसा है कि वह एक वैकल्पिक सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बन सकता है। लेकिन जानकारों की इस संदर्भ में एक अलग मान्यता भी है। उनका मानना है कि भले ही भारत के पास काफ़ी संसाधन हों, फिर भी इस सेक्टर में बीजिंग के दबदबे को जल्द ही कोई चुनौती मिलने की संभावना कम ही आंकी जा रही है।
भारत अभी भी अपने मैग्नेट और उनसे जुड़े मटीरियल का 80-90: हिस्सा चीन से मंगाता है, जिसका दुनिया भर में रेयर अर्थ प्रोसेसिंग के 90: से ज्यादा हिस्से पर कंट्रोल है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश ने 2025 में लगभग 221 मिलियन डॉलर कीमत के मैग्नेट और उनसे जुड़े कच्चे माल का आयात किया। यह निर्भरता तब सामने आई जब पिछले साल एक ट्रेड विवाद के दौरान चीन ने एक्सपोर्ट पर सख्ती बरती, जिससे भारतीय कार बनाने वाली कंपनियों और इलेक्ट्रॉनिक्स फर्मों पर बुरा असर पड़ा और इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) इंडस्ट्री को ’रेयर अर्थ’ मैग्नेट के विकल्प खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि विकल्प खोजने की होड़ में भारत अकेला नहीं है। ईयू, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों ने भी चीन की पकड़ ढीली करने के लिए ऐसी ही कोशिशें शुरू कर दी हैं। फिर भी, भारत के सामने इन देशों के मुकाबले चुनौती ज््यादा पेचीदा है।
‘रेयर अर्थ’ आखिर क्यों इतना ज़रूरी हैं?
‘रेयर अर्थ’- पीरियोडिक टेबल के 17 ऐसे एलिमेंट्स के लिए इस्तेमाल होता है जो हल्के, बहुत मज़बूत और गर्मी सहने वाले होते हैं। इनका उपयोग मुलतः छोटी इलेक्ट्रिक मोटरों में किया जाता हैं - शब्द या नाम को कुछ विशेषज्ञ एक गलत नाम मानते है। प्रोफ़ेसर एक्स्टीन के अनुसार, ’रेयर अर्थ’ दुर्लभ या कम मात्रा में नहीं पाए जाते। केवल सोना ही कम मात्रा में मिलता है, लेकिन वह कोई बहुत ज़रूरी मटीरियल है भी नहीं। जबकि, ’रेयर अर्थ्’ बहुत ज़रूरी हैं। एक आम इलेक्ट्रिक गाड़ी में साइड मिरर और स्पीकर से लेकर विंडस्क्रीन वाइपर और ब्रेकिंग सेंसर तक, दर्जनों पुर्ज़ों में ’रेयर अर्थ’ का इस्तेमाल होता हैं। 2015 के बाद से मैग्नेट बनाने वाले रेयर अर्थ एलिमेंट्स (नियोडिमियम, प्रासियोडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम) की मांग दोगुनी हो गई है। आज की पॉलिसी के हिसाब से, 2030 तक इसमें एक-तिहाई और बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। ऐसा इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और विंड टर्बाइन जैसी नई एनर्जी टेक्नोलॉजी के तेज़ी से इस्तेमाल और बढ़ते इलेक्ट्रिफिकेशन की वजह से हो रहा है। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और डिजिटल टेक्नोलॉजी में बढ़ोतरी 2030 के बाद भी मांग बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी, क्योंकि परमानेंट मैग्नेट इन एप्लीकेशन के लिए सटीक मोशन कंट्रोल, आकार छोटा करने और एनर्जी की बचत को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
‘रेयर अर्थ’ को अक्सर आधुनिक हथियारों के सिस्टम का विटामिन कहा जाता है। इनका इस्तेमाल सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलें, फाइटर एयरक्राफ्ट, रडार सिस्टम, सोनार उपकरण, सैटेलाइट कम्युनिकेशन एवं इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के लिए बहुतायत में होता हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग ने बार-बार रेयर अर्थ को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना है क्योंकि कई एडवांस्ड मिलिट्री प्लेटफॉर्म इन पर निर्भर करते हैं। एक आधुनिक फाइटर एयरक्राफ्ट में सैकड़ों किलोग्राम ‘रेयर-अर्थ’ मटीरियल हो सकता है। ये मॉडर्न इलेक्ट्रॉनिक्स को मुमकिन बनाते है, जैसे स्मार्टफ़ोन, लैपटॉप,कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, फ़ाइबर-ऑप्टिक कम्युनिकेशन सिस्टम, मेडिकल इमेजिंग इक्विपमेंट, इंडस्ट्रियल रोबोट आदि। इनमें भी नियोडिमियम मैग्नेट खास तौर पर अहम हैं क्योंकि ये छोटे डिवाइस में बहुत मज़बूत मैग्नेटिक परफ़ॉर्मेंस देते हैं। ‘रेयर अर्थ’ के बिना, कई इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट बड़े, भारी और कार्य क्षमता में कम कुशल पाए जाते है। ग्लोबल एआई रेस डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और एडवांस्ड इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट पर निर्भर करती है। हाई-परफॉर्मेंस इलेक्ट्रिक मोटर, सटीक मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट, रोबोटिक्स सिस्टम, एडवांस्ड सेंसर, डेटा-सेंटर कूलिंग और पावर सिस्टम आदि ‘रेयर अर्थ’ पर निर्भर टेक्नोलॉजी है।
माइनिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी
90 के दशक में, यूरोप और खासकर फ्रांस में ’रेयर अर्थ’ इंडस्ट्री काफी अहम थी। लेकिन आज दुनिया भर में होने वाली ’रेयर अर्थ’ माइनिंग में चीन की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है और वह दुनिया की 90 प्रतिशत सप्लाई को प्रोसेस करता है। उसने 12 रेयर अर्थ मेटल्स के एक्सपोर्ट पर भी कड़े कंट्रोल लागू किए हैं। यू एस जियोलॉजिकल सर्वे 2025 के अनुसार, इसके भंडार में अनुमानित 44 मिलियन टन ’रेयर अर्थ’ ऑक्साइड हैं, जो दुनिया के ज्ञात भंडार का लगभग आधा है। यू एस इनके हालिया डेटा के अनुसार, चीन ने 2025 में लगभग 270,000 मीट्रिक टन रेयर-अर्थ ऑक्साइड के बराबर उत्पादन किया, जो ग्लोबल माइन प्रोडक्शन का लगभग 69: था। इसके बाद सबसे बड़े उत्पादक देश अमेरिका (13:), ऑस्ट्रेलिया (7:) और म्यांमार (6:) है। फिर चीन का दबदबा सिर्फ़ माइनिंग तक ही सीमित नहीं है। फिर माइनिंग तो, रेयर अर्थ सप्लाई चेन का सिर्फ़ पहला चरण है। चीन की असली ताकत प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग में है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के हालिया एनालिसिस से पता चलता है कि 2024 में दुनिया भर में होने वाले रेयर अर्थ माइन प्रोडक्शन में चीन की हिस्सेदारी लगभग 60: थी। मसलन तब भी दुनिया भर में रेयर अर्थ रिफ़ाइनिंग और सेपरेशन की क्षमता का लगभग 91: हिस्सा चीन के कंट्रोल में ही था।
इसके अलावा, चीन ने ‘रेयर अर्थ’ वाले परमानेंट मैग्नेट (ऐसे चुंबक जो बिना बाहरी बिजली के हमेशा अपने चुंबकीय गुण बनाए रखते हैं) के प्रोडक्शन में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है। दो दशक पहले, कारों, विंड टर्बाइन, इंडस्ट्रियल मोटर, डेटा सेंटर और डिफेंस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले सिंटर्ड परमानेंट मैग्नेट के प्रोडक्शन में चीन की हिस्सेदारी लगभग 50: थी। आज यह हिस्सेदारी बढ़कर 94: हो गई है, जिससे चीन दुनिया का सबसे बड़ा सप्लायर बन गया है। यह कंपोनेंट सबसे शक्तिशाली मोटर बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है, जिनका इस्तेमाल कई आधुनिक कामों में होता है। बाज़ार में इस तरह की भारी हिस्सेदारी के कारण एनर्जी, ऑटोमोटिव, डिफेंस और एआई डेटा सेंटर जैसे अहम सेक्टर की ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावट आने का खतरा बना रहता है।
हालांकि’ रेयर अर्थ’ के मामले में चीन एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना हुआ है, लेकिन कुछ घटनाक्रम ऐसे है जो इस स्थिति को बदल रहे है। 2025 से, बीजिंग ने कई अहम रेयर अर्थ एलिमेंट्स और मैग्नेट के एक्सपोर्ट लाइसेंसिंग नियमों को कड़ा कर दिया है। इन कंट्रोल की वजह से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ के सदस्य देश के मैन्युफैक्चरर्स में चिंता बढ़ रही है, और जो तेजी से वैकल्पिक सप्लाई चेन में भारी निवेश कर रहे हैं।
भारत का रिसोर्स बेस छोटा है, लेकिन अहम
माइन्स मिनिस्ट्री की जुलाई 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास 30 ज़रूरी मिनरल्स का भंडार है, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, कॉपर, टाइटेनियम, टंगस्टन, वैनेडियम और नियोबियम शामिल हैं। भारत के पास रेयर अर्थ मिनरल्स के भंडार भी हैं, जो मुख्य रूप से ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे कई राज्यों में मोनाज़ाइट-युक्त तटीय रेत में पाए जाते हैं। फरवरी में जारी सरकारी प्रेस रिलीज़ के अनुसार, भारत के पास 13.15 मिलियन टन मोनाज़ाइट है, जिसमें अनुमानित 7.23 मिलियन टन रेयर अर्थ ऑक्साइड्स हैं। ज़रूरी मिनरल्स (क्रिटिकल मिनरल्स) बैटरी, सेमीकंडक्टर, मिलिट्री इक्विपमेंट और दूसरी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल होने वाले अहम रिसोर्स हैं। 12 ज़रूरी मिनरल्स के लिए अमेरिका पूरी तरह से इम्पोर्ट पर निर्भर है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने बीजिंग पर निर्भरता कम करने के लिए सोर्सिंग में विविधता लाने पर ज़ोर दिया है। यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, डेविस में ग्लोबल साउथ क्लीन ट्रांसपोर्टेशन सेंटर के डायरेक्टर आदित्य रामजी का मानना है कि भारत वॉशिंगटन के लिए एक अच्छा स्ट्रैटेजिक पार्टनर है क्योंकि यह मिनरल इनपुट वाली टेक्नोलॉजी के लिए मार्केट का दायरा देता है और इसके पास टेक्नोलॉजी और रिसर्च की क्षमता है। अमेरिका और भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाज़ारों में से हैं, जो पूरी वैल्यू चेन में निवेश आकर्षित करने के लिए घरेलू बाज़ार का बड़ा दायरा उपलब्ध कराते हैं। उनके अनुसार, इससे सप्लाई चेन में विविधता लाने से आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिम कम होंगे और कच्चे माल के लिए भरोसेमंद कीमत के संकेत मिलेंगे।
भारत के लिए, ’रेयर अर्थ’ सिर्फ़ एक माइनिंग का मुद्दा भर नहीं रह गया बल्कि ये इंडस्ट्रियल, टेक्नोलॉजिकल और जियोपॉलिटिकल मुद्दा भी हैं। चुनौती साफ़ है- भारत इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी और डिफेंस के क्षेत्र में एक बड़ी मैन्युफैक्चरिंग ताकत बनना चाहता है, लेकिन इनमें से कई इंडस्ट्रीज़ ’रेयर अर्थ’ एलिमेंट्स और परमानेंट मैग्नेट पर निर्भर हैं, जिनकी प्रोसेसिंग मुख्य रूप से चीन में होती है। आत्मनिर्भर भारत, नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन और मेक इन इंडिया जैसे प्रोग्राम के तहत भारत की आत्मनिर्भरता की कोशिशें तेज़ी से इन मटीरियल्स तक पहुँच हासिल करने पर निर्भर होती जा रही हैं।
नवंबर 2025 में, भारत ने 73 अरब रुपये ($800 मिलियन; ख600 मिलियन) की एक योजना को मंज़ूरी दी। इससे ग्लोबल सप्लाई चेन के एक बहुत ही अहम हिस्से ’रेयर अर्थ’ मैग्नेट के लिए चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। ये छोटे लेकिन ताकतवर पार्ट्स आधुनिक जीवन का अहम हिस्सा हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों और विंड टर्बाइन से लेकर स्मार्टफोन, मेडिकल स्कैनर और डिफेंस इक्विपमेंट तक में होता है। रेयर अर्थ का पूरा इकोसिस्टम तैयार करना महंगा, मुश्किल और समय लेने वाला काम है। इसके बजाय, सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ प्रोडक्ट्स में से एक-मैग्नेट-पर ध्यान देकर भारत तेज़ी से आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है।
निष्कर्ष
जिस तरह तेल ने बीसवीं सदी में औद्योगिक और परिवहन क्रांतियों को आगे बढ़ाया, उसी तरह रेयर अर्थ (दुर्लभ खनिज) इक्कीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों-जैसे इलेक्ट्रिक वाहन, रिन्यूएबल एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और आधुनिक रक्षा प्रणालियोंकृको आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। इसीलिए, रेयर अर्थ का भू-राजनीतिक महत्व केवल उनके आर्थिक मूल्य में ही नहीं है, बल्कि इस बात में भी है कि इन सामग्रियों पर नियंत्रण का मतलब उन उद्योगों पर प्रभाव जमाना है जो भविष्य की वैश्विक शक्ति को आकार देने में अहम भूमिका निभाते है।
Image Credit: China Daily
Author
Rekha Pankaj
Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.