This piece was originally written in English. Read it here. It has been translated to Hindi by Rekha Pankaj

साल 2025 को चीन की सॉफ्ट पावर की राह में एक अहम मोड़ के तौर पर याद किया जा सकता है, और जिसके कारण सिर्फ़ जियोपॉलिटिकल महत्वाकांक्षाओं से कहीं ज्यादा हैं। कुछ ही महीनों में, तीन बिल्कुल अलग-अलग चीनी सांस्कृतिक और तकनीकी चीज़ोंः ग्लोबल एनिमेशन हिट फ़िल्म ’ने ज़ा II’ अपनी तरह का एक्शन गेम ‘ब्लैक मिथः वुकॉन्ग’, और ’ ’ब्रेकथू्’ ए आई प्लेटफ़ॉर्म डीपसीक - ने दुनिया भर का ध्यान इस तरह खींचा कि यह मार्केट-ड्रिवन सॉफ्ट पावर पहुंच की पराकाष्ठा को दिखाता है। इनमें से हर एक ने, अपने-अपने क्षेत्र में, तकनीकी इनोवेशन और क्रिएटिविटी का एक अनोखा मेल दिखाया, जिससे दुनिया भर में ज़बरदस्त जुड़ाव और काफ़ी आर्थिक फ़ायदा देखने को मिला। फिर भी, इन उपलब्धियों को जोड़ने वाली चीज़ें न तो सरकारी मदद से है और न ही कोई अंदरूनी वैचारिक डिज़ाइन, बल्कि ये उन डायनामिक मार्केट ताकतों से उभरी हैं जो तेज़ी से यह तय कर रही हैं कि दुनिया भर में चीन को कैसे देखा जाता है।

दशकों से, चीनी सॉफ्ट पावर के एनालिसिस में इस बात की ओर अधिक ध्यान दिया गया है कि क्या बीजिंग आर्थिक डिप्लोमेसी और सरकार-नियंत्रित मीडिया नैरेटिव के ज़रिए एक पंसदीदा नेशनल इमेज बना पाएगा? जोसेफ नाई के थ्योरेटिकल फ्रेमवर्क पर आधारित ये नज़रिए, सॉफ्ट पावर को सार्थक सांस्कृतिक प्रभाव के एक टूल के बजाय जियोपॉलिटिकल फायदे के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले राज्य के एक साधन के रूप में दिखते हैं। फिर भी, जैसा कि इयान एंग जैसे विद्वानों ने तर्क दिया है, सांस्कृतिक प्रभाव सबसे ज्यादा असरदार तब होता है जब वह समाज से स्वाभाविक रूप से निकलता है, न कि ऊपर से थोपा जाता है। इस लिहाज़ से, चीन की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी में महारत हासिल करने की कोशिश में पिछले बारह महीने इस अंतर का एक ज़बरदस्त उदाहरण पेश करते हैं। जबकि ’चीन की कहानी को अच्छी तरह से बताने’  के लिए राज्य के नेतृत्व वाले अभियान, राजनीतिक स्वार्थ के बोझ तले संघर्ष करते रहे। फिर भी चीन के बाज़ार-संचालित सांस्कृतिक उद्योगों ने ऐसे प्रभाव पैदा किए जिन्हें न केवल ज्यादा प्रामाणिक बल्कि विश्व स्तर पर बेहद प्रभावशाली भी माना गया।

जब बाज़ार का इनोवेशन राज्य की प्राथमिकताओं से मिलता है

जब ’ने ज़ा प्प्श् ने बॉक्स ऑफिस पर 6 बिलियन युआन से ज्यादा कमाए, तो इसके प्रभाव को राष्ट्रवादी विषयों के बजाय इसकी एनिमेशन और कहानी कहने की क्वालिटी के लिए कहीं अधिक सराहना मिली। फिल्म ने चरित्र संघर्ष, नैतिक दुविधा और एनिमेशन की उत्कृष्टता पर ध्यान देते हुए एक पारंपरिक किंवदंती को फिर से कहा, जिसने घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों तरह के दर्शकों को आकर्षित किया। इसने स्पष्ट रूप से ’चीनी विशेषताओं’ को बढ़ावा नहीं दिया और अपनी रचनात्मकता और तकनीकी उत्कृष्टता के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। ये एक ऐसा कथात्मक अवसर था, जिसे सीपीसी उजागर करने के लिए बहुत उत्सुक लग रही थी।

गेमिंग इंडस्ट्री में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला। हांग्जो-बेस्ड गेम साइंस स्टूडियो द्वारा डेवलप किया गया ’ब्लैक मिथः वुकॉन्ग’, इस दशक के सबसे तेज़ी से बिकने वाले पीसी गेम्स में से एक बन गया, जिसने कुछ ही हफ़्तों में इसकी 20 मिलियन से अधिक कॉपी बेचीं और अरबों का रेवेन्यू कमाया। ’जर्नी टू द वेस्ट’ के इसके रूपान्तरण ने पौराणिक कहानी को सिनेमैटिक डिज़ाइन और हाई-क्वालिटी गेमप्ले के साथ मिलाया। जबकि पश्चिमी रिव्यूअर्स ने इसकी तुलना ’एल्डन रिंग’ और ’गॉड ऑफ़ वॉर’ जैसे जाने-माने गेम्स से की, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका क्रांतिकारी गेमप्ले फॉर्मेट और विज़ुअल कारीगरी थी, जिसमें एक खास चीनी पहचान भी थी। ‘ने ज़ा II’ और ’ब्लैक मिथः वुकोंग’ दोनों में यह दिखाया गया है कि जब चीनी कहानियाँ तकनीकी उत्कृष्टता पर आधारित होती हैं, तो वे अधिक प्रभावी ढंग से यात्रा कर सकती हैं। चीनी पौराणिक कथाओं और इतिहास से जुड़े होने के बावजूद, प्रोडक्शन की क्वालिटी और डिज़ाइन की सटीकता की वजह से उनकी अपील दुनिया भर में फैली। इससे पता चलता है कि ऑफिशियल कैंपेन के बजाय, बाज़ार चीनी सांस्कृतिक कल्पना को ग्लोबल प्रभाव में बदलने का कहीं ज्यादा असरदार माध्यम बन गया है।

टेक्नोलॉजी में, ए आई प्लेटफॉर्म डीपसीक ने मार्केट-ड्रिवन असर का ऐसा ही पैटर्न दिखाया। हांग्जो की इस कंपनी ने अपने डीपसीक और आर 1 मॉडल से दुनिया भर में ध्यान खींचा, जो बड़े एआई सिस्टम जैसी क्षमताएं देता है और कहा जाता है कि इसकी कीमत बहुत कम है। इसकी आसान कीमत और ओपन एपीआईएस ने कई इलाकों के डेवलपर्स को इसे अपनाने के लिए बढ़ावा दिया, जिससे एक ऐसा यूज़र बेस बना जो चीन से कहीं आगे तक फैला हुआ था। इसका सॉफ्ट-पावर इफ़ेक्ट भी हुआ। डीपसीक की सफलता ने चीन के टेक्नोलॉजी में बेहतर होने के दावे को मज़बूत किया और इसके बड़े टेक इकोसिस्टम को सस्ते और काबिल विकल्पों की तलाश कर रहे छोटे देशों के लिए अधिक भरोसेमंद बना दिया। 

सिनेमा, गेमिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ये तीनों मामले एक साथ देखने पर, इस बात की ओर इशारा करते हैं कि चीनी प्रभाव किस तरह से बड़े पैमाने पर पैदा हुआ, इसमें बदलाव आया है। सॉफ्ट पावर के सबसे ज्यादा दिखने वाले और असरदार रूप तेज़ी से क्रिएटिव इकॉनमी और मार्केट-ड्रिवन इनोवेशन से आ रहे हैं। फिर भी, ये सफलताएँ पार्टी की वैचारिक परियोजना के बाहर मौजूद नहीं हैं। हर एक, अलग-अलग तरीकों से, पार्टी की बड़ी प्राथमिकताओं को दिखाता है, जैसे कि टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास दिखाना और अपनी शर्तों पर पश्चिम के साथ मुकाबला करने, और यहाँ तक कि उससे आगे निकलने की चीन की क्षमता को साबित करना।

इनोवेशन से चलने वाली सॉफ्ट पावर का भविष्य

सालों से, बीजिंग ने विदेशों में अपना प्रभाव दिखाने के लिए राज्य के नेतृत्व वाली वास्तुकला परियोजना पर भरोसा किया है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट, विदेशी मीडिया वेंचर और टारगेटेड मदद/आर्थिक कूटनीति के ज़रिए, बीजिंग ने अपनी पहुंच बढ़ाने और अपने विकास के बारे में लोगों की सोच को आकार देने की कोशिश की है। इन पहलों ने निश्चित रूप से पहचान और प्रभाव बनाया है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां चीन की आर्थिक मौजूदगी बहुत ज्यादा है। फिर भी, उन्होंने एक गहरी स्ट्रक्चरल कमी को भी उजागर किया है। कंट्रोल और योगदान के पैमाने को प्राथमिकता देने की वजह से, राज्य के नेतृत्व वाले प्रयास अक्सर असली जुड़ाव या क्रॉस-कल्चरल अपील पैदा करने में नाकाम रहे हैं। इसके अलावा, अधिक जांच-पड़ताल होने के कारण, ऐसी पहलें कभी-कभी ओवरऑल इमेज को बेहतर बनाने में उलटा असर भी डालती हैं।

पार्टी का मानना रहा है कि सॉफ्ट पावर विदेश में सरकार के निवेश और पॉलिटिकल मैसेजिंग से पैदा की जा सकती है। हालांकि, पिछले साल की सबसे बड़ी कल्चरल सफलताओं की कहानी कुछ और ही है। ’ने ज़ा II’ ’ब्लैक मिथः वुकॉन्ग’ और डीपसीक को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिध्वनि पर जो सकारात्मक जवाब मिला है, वैसा कोई भी सरकारी कैंपेन हासिल नहीं कर पाया है। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्होंने अपनी कल्पना की क्वालिटी की वजह से ध्यान खींचा है और अपने-अपने फील्ड में इनोवेशन की बड़ी चर्चा में योगदान दिया है, जिससे चीन पश्चिम के बराबर, या उससे भी बेहतर, योगदान देने वाला देश बन गया है।

ये अनुभव उन देशों के लिए भी एक रणनीतिक सबक देते हैं जो अपनी सॉफ्ट पावर अपील को बढ़ाना चाहते हैं। एक तरह से स्थापित और उभरती हुई दोनों तरह की शक्तियों के लिए, सबक यह है कि ऐसी स्थितियाँ बनाने में निवेश करें जो इनोवेशन को फलने-फूलने दें, साथ ही ज़रूरत से अधिक सरकारी मैसेजिंग कंट्रोल से बचें। चीनी मामले ने प्रभावी ढंग से दिखाया है कि विज़िबिलिटी और प्रभाव सिर्फ़ वित्तीय निवेश या राजनीतिक संकेत देने का नतीजा नहीं हैं और सॉफ्ट पावर तभी साफ़ तौर पर दिखती है जब वह ठोस योगदान से जुड़ी होती है। इसलिए, किसी देश की सॉफ्ट पावर की क्रेडिबिलिटी उन सेक्टर्स से अधिक बढ़ेगी जो इनोवेशन में वैल्यू जोड़ते हैं और जहाँ असर अपने आप आता है, न कि डिज़ाइन किया हुआ।

Author

Ratish Mehta is a Senior Research Associate at ORCA. He is the co-editor of the Special Issue on India’s Soft Power Diplomacy in South Asia and serves as the co-lead for the project ‘The Episodes of India-China Exchanges: Modern Bridges and Resonant Connections’, which is rooted in the desire to enhance public consciousness of cross-cultural contributions of both societies. Ratish’s area of interest includes understanding the value of Narratives, Rhetoric and Ideology in State and Non-State interactions, deconstructing political narratives in Global Affairs as well as focusing on India’s Foreign Policy interests in the Global South and South Asia. He was previously associated with The Pranab Mukherjee Foundation and has worked on projects such as Indo-Sino relations, History of the Constituent Assembly of India and the Evolution of its Democratic Institutions. He is also the co-convenor of ORCA's Global Conference on New Sinology (GCNS), which is India's premier dialogue driven China conference. He is an alumnus of Ambedkar University, Delhi.

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