सिंधु जल संधि (IWT) को स्थगित रखे जाने की भारत की घोषणा के बाद से पाकिस्तान ही नहीं चीन भी दिल्ली को अपने तेवर दिखा रहा। इस्लामाबाद में एक सेमिनार में बोलते हुए, बीजिंग स्थित सेंटर फॉर चाइना एंड ग्लोबलाइज़ेशन के वाइस प्रेसिडेंट विक्टर गाओ का ये कहना कि- भारत, पाकिस्तान के खिलाफ़ यदि पानी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है, तो चीन के पास भी तिब्बत से निकलने वाली नदियों के बहाव को प्रभावित करने की क्षमता है-यह बताने के लिए काफी है कि उसके लिए ये करीबी साझेदार कितना अहमियत रखता है। भारत को पानी को जियोपॉलिटिकल टूल के तौर पर इस्तेमाल न करने की सलाह देते हुए गाओ ने चीनी फिलॉसफर कन्फ्यूशियस के बहाने दिल्ली को एक तरह से चेतावनी सी दे दी कि दूसरों के साथ वैसा मत करो जैसा तुम नहीं चाहते कि दूसरे तुम्हारे साथ करें।
कहने को तो, गाओ सीमा पार बहने वाली नदियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय नियमों की वकालत करते है, लेकिन ये वे भी भलीभांति जानते होगें कि खुद बीजिंग की पानी को लेकर उसके व्यवहार की अक्सर आलोचना होती आई है। एशिया की कई बड़ी नदियों के उद्गम स्थल पर नियंत्रण होने के बावजूद, चीन हमेशा निचले इलाकों में स्थित देशों के साथ पानी के बंटवारे को लेकर व्यापक समझौते करने से परहेज करता आया है। मेकांग नदी इसका एक अहम उदाहरण है। चीन ने इसके ऊपरी हिस्सों में 11 बड़े बांध बनाए हैं, जिससे उसे नदी के निचले बहाव पर काफी नियंत्रण मिल गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन परियोजनाओं ने नदी के प्राकृतिक जल-विज्ञान (हाइड्रोलॉजी) को बदल दिया है, जिससे म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में खेती, मछली पालन और लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है।
यकीनन दुनिया के सबसे मज़बूत और मुश्किल हालात में भी टिके रहने वाले जल-बंटवारे समझौतों में से एक को कुछ समय के लिए रोकना एक असाधारण घटना है और यह एक हैरान करने वाला, गंभीर और कठोर कदम है। छह दशकों से ज्यादा समय तक, सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार कूटनीतिक रिश्तों के टूटने, हिंसक टकराव और पूर्ण युद्धों के साथ-साथ दोनों तरफ़ बढ़ती राष्ट्रवाद की लहर के बावजूद कायम रहा। अब इसका लड़खड़ाना न सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में, बल्कि इस क्षेत्र की भू-राजनीति और साझा जल संसाधनों की राजनीति और प्रबंधन में भी बदलाव का संकेत है। लेकिन इस संबंध में भारत और पाकिस्तान के बीच चीन का पड़ना आपस में पहले से चल रहे भूरणनीतिक विवादों में एक और विवाद को जन्म दे सकता है। अब चाहे पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी भले ही यह कहे कि, सिंधु जल संधि को रोकने और पाकिस्तान के हिस्से के पानी के कानूनी प्रवाह में बाधा डालने की भारत की कोशिश को उनके देश ने खारिज कर दिया है या चीनी प्रवक्ता धमकी दे कि भारत पड़ोसियों के साथ सहयोग का भाव रखें अन्यथा उनके साथ भी यही किया जा सकता है। इन बयानों से इतर भारत भी अपने मत पर अडिग है। उसका अपना कहना है जब तक पाकिस्तान भरोसेमंद और पक्के तौर पर सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं कर देता, वह इस संधि पर बात नहीं करना चाहेगा। यह कदम भारत में पहलगाम हमले के बाद उठाया गया, जिसे पाकिस्तान में मौजूद माने जाने वाले एक चरमपंथी गुट ने अंजाम दिया था; यह कदम उस हमले के बाद सेना की बढ़ती सक्रियता के दौरान उठाया गया। भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं और पाकिस्तान द्वारा राज्य-प्रायोजित आतंकवाद को कथित समर्थन देने को इस कदम की वजह बताया।
सिंधु जल संधि चुनौती संरचनात्मक है
भारत द्वारा 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को निलंबित किए हुए एक साल हो गया है; यह संधि अंतरराष्ट्रीय जल कानून में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और पश्चिम में इसकी काफी सराहना की जाती रही है। संधि के तहत नदियों का बंटवारा जिस प्रकार से हुआ था उसमें पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास और सतलुज) भारत के हिस्से मे आई और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम और चिनाब) मुख्य रूप से पाकिस्तान को दी गईं। भारत को इनके सीमित और गैर-उपभोक्ता इस्तेमाल (जैसे पनबिजली) की अनुमति भर दी गई। लेकिन असमान रियायतों और पाकिस्तान द्वारा लंबे समय तक रणनीतिक हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल किए जाने से सिंधु नदी प्रणाली पर भारत के विकास कार्यों में बाधा डाली। इस निलंबन के नतीजों ने दोनों देशों के आपसी संबंधों और क्षेत्रीय जल व्यवस्था को बदल दिया है। जहाँ एक ओर भारत अपने हिस्से के पानी का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान, एक सुनियोजित मीडिया अभियान के ज़रिए, लगातार यह दावा कर रहा है कि सिंधु जल संधि के निलंबन से उसकी कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है।
सत्य तो यह है कि पाकिस्तान को सहयोग के नाम पर भारत अभी तक बहुत कुछ छोड़ता आया है। ऊपरी हिस्से में स्थित देश होने के बावजूद, भारत को सिर्फ़ तीन पूर्वी नदियाँ, रावी, ब्यास और सतलुज मिलीं। इन नदियों का पानी बेसिन के कुल बहाव का 20 प्रतिशत से भी कम था और इनमें से ज्यादातर पानी का इस्तेमाल पहले से ही हो रहा था। इतने कम हिस्से के लिए भी, भारत को पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में ज़रूरी बदलावों और निर्माण कार्यों के मुआवज़े के तौर पर 62 मिलियन पौंड देने पड़े। यह असाधारण रियायत शायद उस समय के भू-राजनीतिक दबावों और भारत की विकास संबंधी ज़रूरतों व बेसिन की हाइड्रोलॉजी (जल-विज्ञान) के बारे में उस समय की सीमित समझ का नतीजा रही होगी।
परमानेंट इंडस कमीशन और तीसरे पक्ष की प्रक्रियाओं को विवाद सुलझाने में मददगार बताने वाली बातों में यह बात साफ़ तौर पर छोड़ दी गई है कि पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत की पूरी तरह से जायज़ ’रन-ऑफ-द-रिवर’ पनबिजली परियोजनाओं में रुकावट डालने के लिए बार-बार इन तरीकों का गलत इस्तेमाल किया है। इनमें से कई परियोजनाएं सहायक नदियों पर हैं और उनकी क्षमता 5 मेगावाट से भी कम है, जिससे पाकिस्तान को पानी की उपलब्धता के मामले में कोई खास नुकसान नहीं होता है। पाकिस्तान ने किशनगंगा, बगलिहार और रातले जैसी कई परियोजनाओं पर आपत्तियां उठाई हैं। उसने भारत को ऐसे मध्यस्थता मामलों में घसीटा है जिनके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठते हैं और संधि से जुड़े मंचों का इस्तेमाल असली विवाद सुलझाने के बजाय कूटनीतिक तौर पर परेशान करने के हथियार के तौर पर किया है।
सिंधु नदी संधि और जलवायु के अनुकूल ढलने के उपाय
यह संधि कड़े प्रतिद्वंद्वियों के बीच तीन युद्धों और सीमा विवाद के बहुतेरे टकरावों के बावजूद अब तक कायम रही, और साथ ही साथ ही राजनयिक संबंधों में कई उतार-चढ़ाव भी झेले। बावजूद इन सबके पानी का इस्तेमाल ’सिंधु जल संधि’ के तहत होता रहा। परमाणु हथियार रखने वाले ये पड़ोसी देश उन नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर असहमत हैं जो भारत से बहकर पाकिस्तान में सिंधु नदी बेसिन में जाती हैं। इस संधि में वर्ल्ड बैंक ने मध्यस्थता की थी और सितंबर 1960 में दोनों पड़ोसी देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में सिंधु और उसकी सहायक नदियों को दोनों देशों के बीच बांट दिया और पानी के बंटवारे के नियम तय किए गए थे। लेकिन इस समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं दिया गया है जिसके तहत कोई भी देश एकतरफा तरीके से इसे रोक सके या खत्म कर सके; इसमें विवाद सुलझाने की स्पष्ट व्यवस्था है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों पर कई प्रोजेक्ट्स को लेकर सालों से विवाद और बहस भी जारी है।
इस संधि के तहत रोज़ाना के कामकाज को संभालने के लिए ’परमानेंट इंडस कमीशन’ नाम की एक स्थायी द्विपक्षीय संस्था बनाई गई। हर देश इस कमीशन में अपनी तरफ़ से ’इंडस वाटर्स कमिश्नर’ नियुक्त करता है, और जिसका इंजीनियर होना ज़रूरी था। कमीशन की बैठक साल में कम से कम एक बार होनी तय की गई, जो बारी-बारी से भारत और पाकिस्तान में होती आई है। यह कमीशन नदी के बहाव, पानी के इस्तेमाल और बांधों व नहरों के संचालन से जुड़ी जानकारी के आदान-प्रदान का मुख्य ज़रिया है। कमिश्नर संधि के नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, यह खुद देखने के लिए नदियों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का दौरा भी करते हैं। इस कमीशन का मकसद यह रहा है कि काम-काज से जुड़ी ज्यादातर दिक्कतें-जैसे डेटा में अंतर या किसी खास ढांचे को लेकर सवाल-औपचारिक कानूनी विवाद बनने से पहले ही इसी स्तर पर सुलझा लिया जाएं। देखा जाए तो संधि के अधिकतर समय में कमीशन ने उम्मीद के मुताबिक काम किया है, हालांकि कभी-कभी यह प्रोजेक्ट के डिज़ाइन को लेकर गहरे मतभेदों को दूर करने में नाकाम भी रहा है।
लेकिन गौर करें तो जलवायु परिवर्तन इस संधि को पुराना बना रहा है। 1950 के दशक में जिन बातों को मानकर ये संधि की गई थी, वह अब बदल रही है। हिमालय के ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं; बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढती जा रही हैं; नदियों के बहाव का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता जा रहा है; और तो और दोनों तरफ़ ज़मीन के नीचे का पानी तेज़ी से कम हो रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते को खत्म करने के बजाय इसमें समय के साथ बदलाव किए जाने चाहिए। विश्व बैंक, जिसने इस समझौते को कराने में मदद की थी, अब भी इसे साझा नदियों के प्रबंधन के लिए एक अहम ढांचा मानता है, हालांकि उसने किसी भी पक्ष के मौजूदा कानूनी रुख का समर्थन नहीं किया है। क्लिंगेनडेल इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं का तर्क है कि ’सहयोग का कोई विकल्प नहीं है’ क्योंकि जलवायु से जुड़े दबावों के कारण लंबे समय तक पानी का एकतरफा प्रबंधन टिकाऊ नहीं रह सकता। पानी की सुरक्षा पर काम करने वाले कई विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भविष्य के समझौतों को असरदार बनाए रखने के लिए उनमें जलवायु के अनुकूल ढलने के उपाय, इकोसिस्टम की सुरक्षा, भूजल प्रबंधन और रियल-टाइम डेटा शेयरिंग को शामिल करना ज़रूरी है।
दरअसल, सिंधु बेसिन में नदियों का बहाव मुख्य रूप से हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश से पिघलने वाली बर्फ और ग्लेशियर पर निर्भर करता है। इसके लिए ग्लेशियर, बर्फ की परत (स्नोपैक), बारिश और नदी के बहाव की निगरानी के लिए पूरे बेसिन में एक साझा नेटवर्क बनाने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के कई हिस्सों में ग्लेशियर तेज़ी से पीछे हट रहे हैं, ऐसे में दोनों देशों के वैज्ञानिकों को शामिल करते हुए एक संयुक्त ग्लेशियर रिसर्च सेंटर बनाना जरूरी है और आपातकालीन स्थिति में बातचीत के लिए संयुक्त नियम (प्रोटोकॉल) का होना भी जरूरी है। स्थायी सिंधु आयोग का विस्तार कर इसमें जलवायु वैज्ञानिकों तथा पर्यावरण विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
क्षेत्रीय जल सुरक्षा के तौर पर देखा जाए तो सवाल यह नहीं कि भविष्य में यह संधि अपने मूल रूप में बनी रहेगी या नहीं...बल्कि यह है कि क्या भारत और पाकिस्तान मिलकर कोई ऐसा आधुनिक ढांचा तैयार कर सकते हैं जो आज की वास्तविकताओं के अनुरूप हो। संधि के भविष्य को तय करने वाले मुख्य कारकों में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे सहयोग की भावना से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये है और इस नए तंत्र के बिना, दक्षिण एशिया में पानी की असुरक्षा, कृषि पर दबाव, मानवीय असर और रणनीतिक अविश्वास का खतरा बढ़ने की संभावना प्रबल है।
Image Credit: Al Jazeera
Author
Rekha Pankaj
Mrs. Rekha Pankaj is a senior Hindi Journalist with over 38 years of experience. Over the course of her career, she has been the Editor-in-Chief of Newstimes and been an Editor at newspapers like Vishwa Varta, Business Link, Shree Times, Lokmat and Infinite News. Early in her career, she worked at Swatantra Bharat of the Pioneer Group and The Times of India's Sandhya Samachar. During 1992-1996, she covered seven sessions of the Lok Sabha as a Principle Correspondent. She maintains a blog, Kaalkhand, on which she publishes her independent takes on domestic and foreign politics from an Indian lens.