आर्थिक सहयोग के बावजूद, एससीएस में विवादास्पद संघर्षों ने दशकों से चीन और फिलीपींस के बीच द्विपक्षीय संबंधों को परेशान कर दिया है, जिससे बीजिंग, मनीला और दुनिया को अर्थव्यवस्था-सुरक्षा संबंधों के नाजुक झूले को संतुलित करने का एक सबक मिला है। चीन-फिलीपींस के बिगड़ते संबंधों में ये हालिया घटनाक्रम न केवल इसमें शामिल दोनों पक्षों के लिए, बल्कि उन अन्य राज्यों के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण सबक पेश करते हैं जो खुद को बीजिंग के साथ संघर्ष में पाते हैं।

This piece was originally written in English. Read it here. It has been translated to Hindi by Rekha Pankaj

दक्षिण चीन सागर (एससीएस) में वर्षों तक चीन से गंभीर समुद्री क्षेत्रीय चुनौतियों का सामना करने के बाद फिलीपींस के द्वीपसमूह राष्ट्र ने आखिरकार बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) छोड़ दिया है। समुद्र में बार-बार होने वाले टकराव से जांच पड़ताल सबंधी मामलों में बाधा रही है, सैनिकों और आपूर्ति जहाजों के रोटेशन के खिलाफ नाकेबंदी की कोशिश हो रही है, एससीएस में बीजिंग की आक्रामक रणनीति फिलीपीन के नए राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्काेस जूनियर की स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाने की महत्वाकांक्षाओं को लगातार सीमित कर रही है।

फिलीपींस-चीन संबंधों में तनाव के बावजूद - सबसे महत्वपूर्ण 2016 में फिलीपींस के पक्ष में मध्यस्थता का फैसला था जिसने एससीएस विवाद को एक नए अवतार में केंद्र में ला दिया - दोनों देशों ने बिगड़ती सुरक्षा चिंताओं के बीच मजबूत आर्थिक संबंधों को बनाए रखने की कोशिश की है। 2022 में फिलीपींस के राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक जीत हासिल करने के बाद इस साल जनवरी में अपनी चीन यात्रा पर, मार्कास जूनियर ने केवल दोनों देशों के बीच बीआरआई अनुबंध को अद्यतन (अपडेट) करने सहित 14 सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए, बल्कि 22 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश का मूल्य मनीला के लिए हासिल किया। दोनों देशों के बीच व्यापार हाल के वर्षों में ही बढ़ा है, चीन से फिलीपींस का आयात 2010 से 2017 तक औसतन 20.7 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ा है, जिससे चीन फिलीपींस का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भी बन गया है। हालाँकि, आर्थिक सहयोग के बावजूद, एससीएस में विवादास्पद संघर्षों ने दशकों तक दोनों राज्यों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को परेशान कर दिया है, जिससे बीजिंग, मनीला और दुनिया को अर्थव्यवस्था-सुरक्षा संबंधों की विषम परिस्थिति को संतुलित करने का एक सबक मिला।

समुद्र में बीजिंग की आक्रामक रणनीति से सबक और परिणाम

दशकों से मनीला में सफल नेताओं ने बीजिंग के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने पर अपना ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है, जो क्षेत्रीय संघर्षों से प्रभावित न होने वाले एक स्वस्थ रिश्ते को पेश करने की उनकी इच्छा को दर्शाता है। हालाँकि, मार्काेस जूनियर की अध्यक्षता में, बीजिंग द्वारा विवादित क्षेत्र में और उसके आस-पास अपनाए गए निरंतर और बढ़ते आक्रामक दृष्टिकोण के कारण द्विपक्षीय संबंधों के भीतर त्रुटिपूर्ण चरणों को अधिक प्रमुखता मिली है। फिलीपीन सरकार का बीआरआई-और दो महत्वपूर्ण रेलवे लाइनों से जुड़ी 4.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से दूर जाने का निर्णय मनीला से एक स्पष्ट पुर्नअभिविन्यास है जो एक प्रतिद्वंद्वी के साथ स्वस्थ आर्थिक जुड़ाव बनाए रखने के बजाय राष्ट्रीय समुद्री संप्रभुता के लिए खतरे को प्राथमिकता देने के अपने विरोधी दृष्टिकोण का संकेत देता है, एक सफल रणनीति रही जिसे नई दिल्ली भी बीजिंग के साथ अपनी क्षेत्रीय झड़पों के मद्देनजर लागू किया है।

एक चीनी तटरक्षक (सीसीजी) जहाज की फिलीपीन तटरक्षक (पीसीजी) जहाज और एक सैन्य-संचालित आपूर्ति नाव के साथ टक्कर, जिसे अक्टूबर में बीआरपी सिएरा माद्रे को फिर से आपूर्ति करने का काम सौंपा गया था, बीजिंग के साथ मार्कास की निंदा रणनीति में अंतिम कील साबित हुई है। चीन के परस्पर व्यापक दावों के कारण, विशेष रूप से सिएरा माद्रे के आसपास दोनों देशों के तट रक्षकों के बीच कई गतिरोध और टकराव हुए हैं। फिर भी, इन हालिया टकरावों में जो बात अलग है वह मनीला के जहाजों को प्रतिबंधित करने के लिए चीन द्वारा अपनाया गया आक्रामक रुख है, जो हाल के वर्षों में स्तर और आक्रामकता दोनों में तेज हो गया है।अपने जहाजों पर पानी की बौछारें करने के पीसीजी के आरोपों के अलावा, बीजिंग ने अपने तट रक्षकों द्वारा की जाने वाली गश्त की संख्या भी बढ़ा दी है। सीएसआईएस के एशिया मैरीटाइम ट्रांसपेरेंसी इनिशिएटिव (एएमपीआई) के डेटा से पता चलता है कि दूसरे थॉमस शोल क्षेत्र में सीसीजी के गश्त के दिन सिर्फ एक साल में 232 दिनों से बढ़कर 279 हो गए हैं। इसके अलावा, अन्य विवादित क्षेत्रों जैसे ल्यूकोनिया शॉल्स, एक महत्वपूर्ण मलेशियाई तेल और गैस ऑपरेशन के पास, स्कारबोरो शोल और थिटू द्वीप के आसपास की चट्टानों से डेटा सेट भी दिन और बल दोनों के संदर्भ में बढ़ी हुई गश्त इकाइयों की एक समान रणनीति का अनुमान लगाते हैं। इस तरह के आंकड़े केवल एससीएस में एक प्रमुख स्थिति बनाए रखने पर बीजिंग के ध्यान को दर्शाते हैं, बल्कि फिलीपींस के साथ इस तरह के टकराव के लिए उसकी बढ़ती भूख का भी संकेत देते हैं। इस तरह से मनीला की रणनीति बीजिंग की तरह अधिक प्रतिकूल दृष्टिकोण में स्थानांतरित हो गई।

चीन-फिलीपींस के बिगड़ते संबंधों में ये हालिया घटनाक्रम केवल दोनों पक्षों के लिए, बल्कि उन अन्य राज्यों के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण सबक पेश करते हैं जो खुद को बीजिंग के साथ संघर्ष में पाते हैं। यह स्थिति द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने की कीमत पर, तत्काल और बढ़ते क्षेत्रीय संघर्षों के संबंध में कड़ी लाल रेखाएं बनाए रखने का एक उदाहरण है।बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से पीछे हटकर, मनीला ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि यदि समुद्र में संघर्ष बढ़ता रहा तो आर्थिक व्यस्तताओं को नुकसान होगा, एक संभावना यह है कि बीजिंग निःसंदेह रूप से ये मानता है कि उसकी आर्थिक शक्ति को देखते हुए समझौता नहीं किया जाएगा। यद्यपि चीन फिलीपींस के साथ-साथ भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार पर एक महत्वपूर्ण बढ़त रखता है, लेकिन चीन को अपने आक्रामक दृष्टिकोण को बनाए रखने से रोकने के लिए, यदि समुद्र या भूमि पर संघर्ष जारी रहता है तो आर्थिक और साथ ही राजनीतिक व्यस्तताओं में गिरावट की रणनीति जारी रहनी चाहिए -एक ऐसी रणनीति जिसे बीजिंग ने शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने के लिए लगातार लागू किया है। इसके अलावा, इस तरह के दृष्टिकोण को इस तरह से भी क्रियान्वित किया जाना चाहिए जो बीजिंग को क्षेत्रीय और समुद्री घुसपैठ के आर्थिक परिणामों का स्पष्ट रूप से संकेत दे, साथ ही यह भी दावा करे कि लोकतांत्रिक आर्थिक साझेदार एक विश्वसनीय और सुरक्षित विकल्प के रूप में उसकी स्थिति को बदल सकते हैं।

चीन के लिए, आर्थिक परिणाम क्षेत्रीय झड़पों में उसके आक्रामक दृष्टिकोण की सीमा दिखाने में एक मूल्यवान सबक के रूप में काम करने चाहिए। इस तरह की घटनाओं से चीन को याद दिलाना चाहिए कि क्षेत्रीय आक्रामक होने के बावजूद बीजिंग के साथ आर्थिक संबंध कायम हैं और दबाव पड़ने पर इसे कम भी किया जा सकता है। इस प्रकार, यदि इसकी तेजी की रणनीति जारी रहती है, तो बीआरआई, जीएसआई, जीसीआई और अन्य जैसी वैश्विक पहलों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय संबंधों में सुरक्षा परिणाम केंद्र स्तर पर आने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

चीन की आक्रामकता फिलीपींस के गठबंधनों की परीक्षा है

फिलीपींस के संबंध में चीन के कठोर दृष्टिकोण का उद्देश्य अमेरिका के साथ अपने गठबंधन का परीक्षण करना भी है, क्योंकि दोनों राज्यों के बीच पारस्परिक रक्षा संधि (एमडीटी) पर हस्ताक्षर किए गए हैं जो संघर्ष के दौरान वाशिंगटन के सैन्य हस्तक्षेप का आह्वान करता है। ऐसे मामले में हस्तक्षेप करने के लिए वाशिंगटन की कठोर प्रतिबद्धता के बारे में अस्पष्टता ने भी बीजिंग की आक्रामक रणनीति में एक भूमिका निभाई है, जो उसे ऐसी स्थितियों को भड़काकर समुद्र में अपनी जमीन का परीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित करती है जो इस तरह के गठबंधन पर सवाल उठाती है। हालांकि राष्ट्रपति बिडेन ने हाल ही में कहा था कि वाशिंगटन एससीएस में तैनात फिलीपीन जहाजों, विमानों या सैनिकों पर किसी भी हमले का जवाब देगा, जैसा कि एमडीटी में रेखांकित किया गया है, चीन अब मुकाबले के लिए इतने कम पैमाने पर अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ अपना दांव लगाने को तैयार है। इसे बार-बार ग्रे ज़ोन रणनीति को तैनात करके, इसके तट रक्षक, समुद्री पुलिस और समुद्री मिलिशिया तक टकराव को सीमित करके सुनिश्चित किया गया है जो इसके क्षेत्रीय दावों को मजबूत करते हैं और क्षेत्र में बीजिंग की स्थिति को मजबूत करते हैं। पिछले साल की सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि सैकड़ों चीनी मिलिशिया जहाजों ने अपना अभियान जारी रखा है और विवादित एससीएस क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति बनाए रखी है, जिससे अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ियों के साथ दोबारा झड़प की संभावना काफी बढ़ गई है।

बीजिंग की रणनीति ने मार्कास जूनियर के 'पुनर्संतुलन दृष्टिकोण' को और भी तनावपूर्ण बना दिया है, जिसे उनके राष्ट्रपति अभियान के दौरान रेखांकित किया गया था। आक्रामक रणनीति ने वर्तमान सरकार को उन्नत रक्षा सहयोग समझौते (ईडीसीए) के हिस्से के रूप में महत्वपूर्ण ठिकानों तक वाशिंगटन की पहुंच का विस्तार करने के लिए प्रेरित किया है, जो इसे एससीएस के साथ-साथ ताइवान के दक्षिणी तटों तक अधिक पहुंच प्रदान करेगा। अमेरिका के साथ मनीला के गठबंधन का परीक्षण करने के चीन के प्रयास ने वाशिंगटन के साथ अधिक सहयोग को बढ़ावा दिया है और दोनों के बीच आर्थिक सहयोग के लिए अधिक जगह सक्षम की है, एक ऐसा प्रस्ताव जो संभावित रूप से मनीला पर बीजिंग के आर्थिक गढ़ की जगह ले सकता है।

इससे भी अधिक, चीन से दूर नीतियों के पुनः उन्मुखीकरण ने जापान के साथ अधिक रक्षा संबंधों की संभावनाएं भी खोली हैं जो मनीला के शीर्ष रक्षा भागीदार के रूप में उभरा है। इस महीने प्रधान मंत्री किशिदा की मनीला की हालिया यात्रा ने एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते, विजिटिंग फोर्सेज एग्रीमेंट की बातचीत को फिर से मजबूत किया, जो सैनिकों को संयुक्त सैन्य अभ्यास के लिए एक-दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति देगा। इसके अलावा, समुद्र में फिलीपींस की कानून प्रवर्तन क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त जापानी गश्ती जहाज, रक्षा उपकरण और रडार प्रदान करने की घोषणाएं भी मनीला के समुद्री बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों की इच्छा को दर्शाती हैं, खासकर इसके क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए।

फिलीपींस आगे का रास्ता

बीजिंग की हालिया रणनीति के जवाबी दृष्टिकोण के हिस्से के रूप में, मार्कास जूनियर की सरकार के तहत मनीला से वाशिंगटन और टोक्यो दोनों के साथ निकटता से जुड़ने की उम्मीद है, यहां तक कि त्रिपक्षीय रक्षा व्यवस्था बनाने की हद तक भी। हालाँकि वाशिंगटन संशय में रह सकता है, लेकिन यह दृष्टिकोण मनीला को एससीएस में चीन की लगातार आक्रामकता को रोकने के लिए कुछ आवश्यक लाभ प्रदान करेगा। बीजिंग से दूर जाने से अन्य साझेदारों के लिए आर्थिक अवसर भी खुल जाते हैं, जिनका लाभ उठाया जा सकता है, यह देखते हुए कि मनीला सुरक्षा खतरों के मद्देनजर बीजिंग के साथ आर्थिक सहयोग में गिरावट के अपने दृष्टिकोण पर कायम है। अन्य राज्य भी चल रहे विवाद को करीब से देख रहे होंगे और यह आकलन कर रहे होंगे कि बीजिंग फिलीपींस में रणनीतिक हितों के पुनर्मूल्यांकन पर कैसे प्रतिक्रिया देता है, क्योंकि बीजिंग की आक्रामक रणनीति में उभरती हुई खामियों से सबक लिया जा सकता है। जब तक बीजिंग के साथ सीधे टकराव में रहने वाले राज्यों द्वारा इस तरह के सबक नहीं लिए जाते हैं और उन्हें लागू नहीं किया जाता है, तब तक वह अपने आक्रामक दृष्टिकोण और अन्य ग्रे जोन रणनीतियों को तैनात करना जारी रखेगा, जिससे विवादों में और वृद्धि होगी।

Author

A postgraduate in Global Studies from Ambedkar University, Delhi, Ratish’s area of interest includes understanding the value of Narratives, Rhetoric and Ideology in State and Non-State interactions, deconstructing political narratives in Global Affairs as well as focusing on India’s Foreign Policy interests in the Global South and South Asia. He was previously associated with The Pranab Mukherjee Foundation and has worked on projects such as Indo-Sino relations, History of the Constituent Assembly of India and the Evolution of Democratic Institutions in India. His forthcoming projects at ORCA include a co-edited Special Issue on India’s Soft Power Diplomacy in South Asia, Tracing India’s Path as the Voice of the Global South and Deconstructing Beijing’s ‘Global’ Narratives.

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