This piece was originally written in English. Read it here. It has been translated to Hindi by Rekha Pankaj.
पिछले कुछ वर्षों में, खासकर कोविड-19 महामारी के बाद से, बीजिंग ने इस बात पर अधिक जोर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की छवि कैसी बने। हालांकि विदेशों में चीन की छवि को प्रभावित करने की कोशिशें कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन आज जो बात ज्यादा महत्वपूर्ण है, वह यह है कि चीन की कहानी बताने की इस प्रक्रिया में किन लोगों को शामिल किया जा रहा है-विदेशी सोशल मीडिया क्रिएटर्स, ट्रैवल व्लॉगर्स और इन्फ्लुएंसर्स, विदेशों में चीन के बारे में लोगों की धारणा बनाने की बीजिंग की कोशिशों का एक अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। प्रायोजित यात्राओं, विशेष पहुंच और अन्य तरह के जुड़ाव के जरिए, लाखों फॉलोअर्स वाले ये क्रिएटर्स ऐसा कंटेंट बना रहे हैं जो चीन के विकास, आधुनिकता और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी धारणाओं को आकार दे सकता है। विदेशी क्रिएटर्स की खासियत यह है कि उनके निजी अनुभवों को काफी प्रामाणिक माना जाता है; चीन के बारे में उनके कंटेंट और वीडियो में एक ऐसी विश्वसनीयता होती है, जिसे हासिल करने में अक्सर सरकारी प्रचार-प्रसार को भी मुश्किल होती है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन आवाज़ों की तलाश में बीजिंग का प्रयास एक स्पष्ट क्षेत्रीय रूप ले रहा है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के रचनाकारों के साथ उसका जुड़ाव यह दर्शाता है कि वह ऐसी आवाज़ों को बढ़ावा देने पर अधिक ज़ोर दे रहा है, जो सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से उन दर्शकों के करीब हैं, तक चीन पहुँचना चाहता है। जिन दर्शकों के चीन के साथ पहले से ही गहरे आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध हैं, उनके बीच ये आवाज़ें चीन को अधिक परिचित बनाने और समय के साथ क्षेत्रीय डिजिटल स्पेस में उसे और अधिक सामान्य रूप से स्थापित करने में योगदान दे सकती हैं। इसलिए, इस बदलाव का महत्व केवल अलग-अलग इन्फ्लुएंसर अभियानों तक सीमित नहीं है; यह उस व्यापक रणनीति की ओर इशारा करता है, जिसके ज़रिए बीजिंग विदेशों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। इस पृष्ठभूमि में, दक्षिण एशिया-ख़ासकर भारत-को बीजिंग की उभरती हुई इन्फ्लुएंसर रणनीति पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है और ये जानने की जरूरत है कि निकट भविष्य में चीन की 'सॉफ्ट-पावर' रणनीति कहां तक जा सकती है?
परिचित आख्यान गढ़ने के लिए दूसरों के शब्दों का सहारा लेना
चीन की तकनीकी प्रगति, अर्थव्यवस्था, जन सुरक्षा या सामाजिक विकास के बारे में आधिकारिक दावों में सरकारी प्रचार की स्पष्ट छाप दिखाई देती है, जबकि विदेशी रचनाकारों की ऐसी ही टिप्पणियाँ अधिक स्वतंत्र और उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित लग सकती हैं।इससे विदेशी रचनाकारों को एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका मिल जाती है, जिससे ऐसी कहानियाँ या नैरेटिव प्रसारित हो पाते हैं जो चीन की मनचाही अंतरराष्ट्रीय छवि के अनुरूप होते हैं, और इनमें आधिकारिक संचार की तरह कोई स्पष्ट संस्थागत पहचान भी नहीं होती। चीनी अधिकारियों ने खुद इस फायदे को पहचाना है। विदेश मंत्रालय ने विदेशी इन्फ्लुएंसर्स की लाइवस्ट्रीम के बारे में कहा है कि ये चीन को ’जैसा वह है, वैसा ही’ दिखाती हैं। साथ ही, मंत्रालय ने यह भी गौर किया है कि विदेशी दर्शकों को एक ऐसा चीन देखने को मिल रहा है, जो उनके द्वारा पहले सुनी गई बातों से बिल्कुल अलग है।
यह विश्वसनीयता 'क्यूरेटेड ऑथेंटिसिटी' (सोच-समझकर तैयार की गई प्रमाणिकता) से और मजबूत होती है। इसमें कंटेंट का प्रभाव क्रिएटर के अपने निजी अनुभवों से आता है, जबकि वह माहौल जिसमें ये अनुभव घटित होते हैं, पहले से ही सुनियोजित हो सकता है। उदाहरण के लिए, शिनजियांग की यात्रा करने वाले विदेशी इन्फ्लुएंसर्स पर की गई रिसर्च से पता चला है कि उनके वीडियो में दिखने वाली कुछ जगहों को सरकारी संस्थाओं ने चुना था। इसके अलावा, उनके द्वारा बनाए गए कंटेंट को चीनी सरकार से जुड़े अकाउंट्स ने बड़े पैमाने पर नए रूप में पेश किया और उसे और अधिक लोगों तक पहुँचाया। केवल जनवरी 2020 से अगस्त 2021 के बीच, एएसपीआई ने सरकार के नियंत्रण वाले 156 अकाउंट्स से कम से कम 546 ऐसी पोस्ट और लेखों की पहचान की, जिन्होंने 13 इन्फ्लुएंसर्स के शिनजियांग से जुड़े कंटेंट को बड़े स्तर पर प्रचारित किया। जब हम इस प्रचार को उन नैरेटिव्स (कहानियों/दृष्टिकोणों) के साथ रखकर देखते हैं जिन्हें सरकारी मीडिया प्रमुखता से सामने लाता है, तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
बार-बार सामने आने वाला विषय यह है कि विदेशी रचनाकार प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से 'वास्तविक चीन' की खोज करते हैं, जो अक्सर देश के बारे में उनकी पूर्व धारणाओं के विपरीत होता है। उदाहरण के लिए, पाकिस्तानी व्लॉगर महज़ैब अब्बासी, जिनके ल्वनज्नइम पर 213,000 से अधिक सब्सक्राइबर हैं, को दक्षिण एशियाई दर्शकों को मौजूदा रूढ़ियों से परे एक रोजमर्रा के चीन को दिखाने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि भारतीय रचनाकारों को भी इसी तरह एक ऐसे देश का अनुभव करने के लिए सराहा गया है जो उनकी अपेक्षाओं से भिन्न था। 2026 में, 'चाइना डेली' ने हेनान के एक संगठित मीडिया दौरे के बाद भारतीय रचनाकार अनायत अली पर एक लेख प्रकाशित किया और बाद में उनके अनुभवों को 'टेलिंग स्टोरीज वेल' नामक एक मंच पर रखा। इस प्रकार, विदेशी रचनाकार एक प्रकार के तीसरे पक्ष के सत्यापन का स्रोत बन जाते हैं, और व्यक्तिगत अनुभव इस बात को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं कि चीन के बारे में नकारात्मक धारणाएं आंशिक रूप से दूरी या गलतफहमी के कारण उत्पन्न होती हैं।
यही तंत्र घरेलू स्तर पर भी काम कर सकता है। उदाहरण के लिए, 'ग्लोबल टाइम्स' के एक लेख में नेपाली इन्फ्लुएंसर गरिमा घिमिरे ने बताया कि चीन में सर्विलांस कैमरे, सुरक्षा जांच और सुलभ पुलिस व्यवस्था से उन्हें सुरक्षित महसूस करने में मदद मिलती है। बाद में, सरकारी मीडिया ने उनकी इन बातों को 'एक सुरक्षित चीन' के व्यापक नैरेटिव में शामिल कर लिया। इस तरह, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्विलांस और सरकारी नियंत्रण से जुड़ी प्रथाओं को 'बेहतर पुलिसिंग' के रूप में पेश किया गया। यह नैरेटिव घरेलू स्तर पर भी असर डालने के लिए तैयार किया गया लगता है, जहां आधिकारिक विमर्श में सामाजिक स्थिरता को राष्ट्रीय ताकत की नींव माना जाता है। चीन की 'प्रदर्शन-आधारित वैधता' (performance & based legitimacy) के संदर्भ में, सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के बारे में विदेशियों की सकारात्मक राय, चीनी मॉडल की उन खूबियों को और मजबूत कर सकती है जो देश की सीमाओं के बाहर भी दिखाई देती हैं।
पड़ोसी देशों तक चीन की कहानी पहुँचाना
चीन का क्षेत्रीय मध्यस्थों को तैयार करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिन लोगों या समूहों के साथ वह जुड़ रहा है, उनका दायरा बढ़ता हुआ दिख रहा है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) के 'इंटरनेशनल लियाजन डिपार्टमेंट' (ILD) ने दक्षिण एशिया में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं। इसके साथ ही, क्षेत्रीय स्तर पर चीन ने राजनीतिक प्रतिनिधियों को 'थिंक टैंक और मीडिया' से जुड़े लोगों के साथ एक मंच पर लाने का काम किया है। उदाहरण के लिए, 2022 में आईएलडी के नेतृत्व में आयोजित एक सम्मेलन में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के 40 से अधिक राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के 100 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए। इस सम्मेलन में विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया गया कि 'बेल्ट एंड रोड' सहयोग के लिए 'जनमत का आधार' मज़बूत करने में ये नेटवर्क कितनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसी तरह, बीजिंग की नई प्रभाव रणनीति में ऐसे मध्यस्थों को शामिल किया गया है, जो पारंपरिक राजनीतिक और बौद्धिक हलकों से परे, आम जनता तक पहुँचने की क्षमता रखते हैं। इन नेटवर्कों की सामाजिक पहुँच में एक बड़ा बदलाव आया है; अब पारंपरिक जुड़ाव के साथ-साथ डिजिटल क्रिएटर्स भी इसमें शामिल हो गए हैं। ये क्रिएटर्स उन लोगों को प्रभावित कर सकते हैं, जिन्हें चीन के सरकारी मीडिया की विश्वसनीयता पर संदेह है।
दक्षिण एशियाई क्रिएटर्स के साथ बीजिंग के बढ़ते जुड़ाव का महत्व, इन संपर्कों के इर्द-गिर्द विकसित हो रहे क्षेत्रीय ढांचे में भी निहित है। 2025 के आखिर से, चीन ने क्रिएटर्स के साथ केवल एक बार होने वाले जुड़ाव से आगे बढ़कर, संस्थागत स्तर पर अधिक स्थायी संबंधों की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, दिसंबर 2025 में, 'युन्नान मीडिया ग्रुप' ने बांग्लादेश के पांच इन्फ्लुएंसर्स को युन्नान में एक सप्ताह के कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। इस दौरान उन्होंने विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, कृषि केंद्रों, तकनीकी सुविधाओं और सांस्कृतिक स्थलों का दौरा किया। चीनी आयोजकों ने उन्हें 'युवा ओपिनियन लीडर्स' (युवा विचार-नेता) कहा और संकेत दिया कि वे भविष्य में और अधिक बांग्लादेशी क्रिएटर्स को 'दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया इन्फ्लुएंसर एलायंस' गठबंधन में शामिल करने की योजना बना रहे हैं। जून 2026 में, सीपीसी युन्नान प्रांतीय समिति के प्रचार विभाग ने पहली 'दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर्स कॉन्फ्रेंस' आयोजित की। इसमें इस क्षेत्र के कंटेंट क्रिएटर्स को एक साथ लाया गया और उन्हें कई तरह की सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल किया गया। केवल एक बार के प्रायोजित दौरों से आगे बढ़कर, ये पहल ऐसे स्थायी मंच तैयार करती हैं, जिनके ज़रिए चीनी संस्थान पूरे क्षेत्र के कंटेंट क्रिएटर्स के साथ अपने संबंध बनाए रख सकते हैं।
इसके अलावा, दक्षिण एशियाई क्रिएटर्स के साथ करीबी रिश्ते बनाने की बीजिंग की कोशिश रणनीतिक रूप से काफी अहम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भौगोलिक निकटता एक तरह की विश्वसनीयता पैदा कर सकती है, जिसे पश्चिमी क्रिएटर्स के लिए दोहराना आसान नहीं होगा। उदाहरण के लिए, एक पाकिस्तानी क्रिएटर चीन और पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) की तुलना कर सकता है; वहीं, एक भारतीय क्रिएटर चीन के सार्वजनिक परिवहन, शहरी विकास या कंज्यूमर टेक्नोलॉजी को भारतीय दर्शकों के जाने-पहचाने अनुभवों के संदर्भ में पेश कर सकता है। इस तरह की तुलनाओं को उनके निजी अनुभवों के तौर पर देखा जाएगा, जो स्थानीय दर्शकों को अधिक प्रामाणिक और अपने से जुड़े हुए लग सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि भले ही कंटेंट सीधे तौर पर राजनीतिक न हो, फिर भी यह उन नैरेटिव्स (विचारों) को बढ़ावा दे सकता है, जिन्हें सीपीसी (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी) चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय दर्शक चीन के साथ जोड़कर देखें।
यह क्षेत्रीय फोकस भारत में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ चीन के बारे में लोगों की धारणाएँ अक्सर आलोचनात्मक घरेलू मीडिया चर्चाओं से प्रभावित रही हैं, जिनमें सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का बोलबाला है। हालाँकि, जैसे-जैसे लोग समाचारों के लिए सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहे हैं, इन धारणाओं को आकार देने वाले स्रोत भी बदल रहे हैं। 2026 के एक सर्वेक्षण में 58 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे समाचारों के लिए यूट्यूब का उपयोग करते हैं, जबकि 44 प्रतिशत लोग टेलीविजन का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह, क्षेत्रीय कंटेंट क्रिएटर्स चीन के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण सामने ला रहे हैं-एक ऐसे सूचना परिवेश में, जो अब विभिन्न हस्तियों और प्लेटफॉर्मों द्वारा तय हो रहा है। हो सकता है कि एक अकेला वीडियो दर्शकों की सोच पर बहुत कम असर डाले, लेकिन स्थानीय संदर्भों से जुड़ा और आसानी से समझ आने वाला कंटेंट अगर लगातार मिलता रहे, तो यह धीरे-धीरे उन पैमानों को बदल सकता है, जिनके जरिए आज के डिजिटल युग में दर्शक चीन को समझते और परखते हैं।
दक्षिण एशियाई प्रतिक्रिया की दिशा में
दक्षिण एशियाई देशों के लिए चुनौती यह है कि वे चीन के हर सकारात्मक चित्रण को केवल 'प्रचार' (प्रोपगैंडा) न मानें, और न ही यह मान लें कि चीन जाने वाला हर क्रिएटर किसी सुनियोजित 'प्रभाव अभियान' (इन्फ्लुएंस ऑपरेशन) का हिस्सा है। हो सकता है कि कई क्रिएटर केवल यात्रा करने, कंटेंट बनाने और एक ऐसे देश के साथ जुड़ने के मौकों का लाभ उठा रहे हों, जो अपना वैश्विक डिजिटल दायरा बढ़ा रहा है। हालाँकि, इस तरह की प्रायोजित यात्राओं के पीछे की संरचना पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है-जैसे कि इन यात्राओं की व्यवस्था कौन करता है, इनके लिए फंड कौन देता है, इसमें कौन-सी संस्थाएँ शामिल हैं, बाद में किस तरह के संबंध बनते हैं, और तैयार किए गए कंटेंट को किस तरह से आगे बढ़ाया (प्रसारित किया) जाता है।
भारत के लिए, इस बदलाव को समझने के लिए व्यक्तिगत वीडियो या प्रभावशाली व्यक्तियों से परे जाकर उस व्यापक सूचना परिवेश को देखना आवश्यक है जिसमें वे काम करते हैं। अधिक प्रासंगिक प्रश्न यह हैं कि क्या बार-बार देखने से अधिक परिचितता या विश्वास उत्पन्न होता है, कौन से दर्शक इन कथाओं के प्रति सबसे अधिक ग्रहणशील हैं, और क्या दर्शकों की धारणाएं तब बदलती हैं जब उन्हें पता चलता है कि किसी रचनाकार की यात्रा चीनी संस्थानों द्वारा सुगम बनाई गई थी। इसके प्रभाव अधिक सूक्ष्म हो सकते हैं, जिससे चीन की तकनीकी प्रगति और शासन तंत्र परिचित संदर्भ बिंदु बन जाते हैं जिनके आधार पर दर्शक अपने देशों का मूल्यांकन करते हैं। इन पैटर्नों को ट्रैक करने की क्षमता विकसित करने से भारत चीन की रचनाकार कूटनीति के वास्तविक परिणाम का आकलन कर सकेगा, बिना उसके प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर बताए या चीनी सॉफ्ट पावर के विकसित होते रास्तों को अनदेखा किए।
Author
Ophelia Yumlembam
Ophelia Yumlembam is a Research Associate at the Organisation for Research on China and Asia (ORCA). Before joining ORCA, she worked at the Dept. Of Political Science, University of Delhi, and interned at the Council for Strategic and Defence Research in New Delhi. She graduated with an M.A. in Political Science from the DU in 2023. Ophelia focuses on security and strategic-related developments in Myanmar, India's Act East Policy, India-Myanmar relations, and drugs and arms trafficking in India’s North Eastern Region. Her writings have been featured in the Diplomat, South Asian Voices (Stimson Centre), 9dashline, Observer Research Foundation, among other platforms.
Chitra Nair
Chitra Nair is a postgraduate in Chinese Studies from SOAS University of London, holding a bachelor’s degree in International Relations with a minor in Environmental Studies from FLAME University, India. Her research explores contemporary Chinese politics, digital activism, political expression and censorship. She is especially interested in how the state and citizens negotiate power and legitimacy, questions which she seeks to explore through a political sociology lens. She previously interned at the Institute of Chinese Studies, New Delhi, where she published work on media censorship and the queer community in China. Her dissertation, Digital Panopticon : Activism and State Surveillance in China, examines digital activism and censorship in China through three key case studies.